संपर्क भाषा क्या होता है? परिभाषा, परिचय, विशेषताएँ और सम्पर्क भाषा के रूप में हिंदी

भाषा वह साधन है जिसके माध्यम से हम अपने विचारों को अपने आसपास के लोगों के साथ आदान-प्रदान करते हैं। यह किसी एक व्यक्ति की सम्पत्ति नहीं है, बल्कि यह तो समाज की उपज है। अब भाषा भी के भी कई प्रकार हैं, जैसे राष्ट्रभाषा, राजभाषा, जनभाषा, सम्पर्क भाषा, आदि। और आज हम इसी के बारे में विस्तार से बात करेंगे कि Sampark Bhasha Kise Kahte Hai?

भाषा की सामान्य परिभाषा में यह कह सकते हैं कि भाषा मनुष्य के विचार विनिमय और भावों की अभिव्यक्ति का साधन है। संपर्क भाषा का आशय जनभाषा है। दूसरे शब्दों में क्षेत्र विशेष की संपर्क भाषा ही जनभाषा है। इसलिए जरुरी नहीं कि जनभाषा शुद्ध साहित्यिक रूप वाली ही हो या वह व्याकरण के नियम से बंधी हो।

सम्पर्क भाषा किसे कहते हैं?

सम्पर्क भाषा वह भाषा होती है जो किसी क्षेत्र, प्रदेश या देश के ऐसे लोगों के बीच पारस्परिक विचार विनिमय के माध्यम का काम करे, जो एक-दूसरे की भाषा नहीं जानते। दूसरे शब्दों में विभिन्न भाषा-भाषी वर्गों के बीच संप्रेषण (communication) के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है, वह सम्पर्क भाषा कहलाती हैं।

इस प्रकार ‘संपर्क भाषा’ की सामान्य परिभाषा होगी। एक भाषा-भाषी जिस भाषा के माध्यम से किसी दूसरी भाषा के बोलने वालों के साथ सम्पर्क स्थापित कर सके, उसे संपर्क भाषा या जनभाषा कहते हैं।

सम्पर्क भाषा की विशेषताएँ

  • बकौल डॉ॰ पूरनचंद टंडन ‘सम्पर्क भाषा से तात्पर्य उस भधा से हैं जो समाज के विभिन्न वर्गों या निवासियों के बीच संपर्क के काम आती है।” इस दृष्टि से भिन्न-भिन्न बोली बोलने वाले अनेक वर्गों के बीच हिंदी एक सम्पर्क भाषा हैं और अन्य कई भारतीय क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलने वालों के बीच भी संपर्क भाषा है।
  • डॉ॰ महेंद्र सिंह राणा ने संपर्क भाषा को इन शब्दों में परिभाषित किया है- “परस्पर अबोधगम्य भाषा या भाषाओं की उपस्थिति के कारण जिस सुविधाजनक विशिष्ट भाषा के माध्यम से दो व्यक्ति, दो राज्य, कोई राज्य या केंद्र तथा दो देश संपर्क स्थापित कर पाते हैं, उस भाषा विशेष को संपर्क भाषा कहा जा सकता है।
  • इस क्रम में डॉ॰ दंगल झाल्टे द्वारा प्रतिपादित परिभाषा उल्लेखनीय हैं- ‘अनेक भाषाओं की उपस्थिति के कारण जिस सुविधाजनक विशिष्ट भाषा के माध्यम से व्यक्ति-व्यक्ति, राज्य-राज्य, राज्य-केंद्र तथा देश-विदेश के बीच संपर्क स्थापित किया जाता है, उसे सम्पर्क भाषा की संज्ञा दी जा सकती है।

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि संपर्क भाषा मात्रा दो यादों से अधिक भिन्न-भिन्न भाषा-भाषियों के बीच सम्पर्क का माध्यम नहीं बनती, जो एक-दूसरे की भाषा से परिचित नहीं है, अपितु दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी राज्यों के बीच तथा केंद्र और राज्यों के बीच भी स्थापित करने का माध्यम बन सकती है।

सम्पर्क भाषा के रूप में हिंदी

भारत एक बहुभाषी देश है और बहुभाषा भाष्ज्ञी देश में संपर्क भाषा का विशेष महत्त्व है। अनेकता में एकता हमारी अनुपम परंपरा रही है। वास्तव में सांस्कृतिक दृष्टि से सारा भारत सदैव एक ही रहा है।

हमारे इस विशाल देश में जहाँ अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोली जाती है और जहाँ लोगों के रीति-रिवाजों, खान-पान, पहनावे और रहन-सहन तक में भिन्नता हो वहाँ सम्पर्क भाषा ही एक ऐसी कड़ी है जो एक छोर से दूसरे छोर तक के लोगों को जोड़ने और उन्हें एक दूसरे के समीप लाने का काम करती है।

डॉ॰ भोलानाथ्वा तिवारी ने संपर्क भाषा के प्रयोग को तीन स्तरों पर विभाजित किया है- एक तो वह भाषा जो एक राज्य से दूसरे राज्य के राजकीय पत्र-व्यवहार में काम आए। दूसरे वह भाषा जो केंद्र और राज्यों के बीच पात्र-व्यवहारों का माध्यम हो। और तीसरे वह भाषा जिसका प्रयोग एक क्षेत्र/प्रदेश का व्यक्ति दूसरे क्षेत्र/प्रदेश के व्यक्ति से अपने निजी कामों में करें।

आजादी की लड़ाई लड़ते समय हमारी यह कामना थी कि स्वतंत्र राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रभाषा होगी जिससे देश एकता के सूत्र में सदा के लिए जुड़ा रहेगा। महात्मा गाँधी, लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाषचंद्र बोस आदि सभी महापुरुषों ने एक मत से इसका समर्थन किया, क्योंकि हिंदी हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक धार्मिक आंदोलनों की ही नहीं अपितु राष्ट्रीय चेतना एवं स्वाधीनता आंदोलन की अभिव्यक्ति की भाषा भी रही है।

हिंदी राष्ट्रभाषा या सम्पर्क भाषा क्या है?

भारत में ‘हिंदी’ बहुत पहले संपर्क भाषा के रूप में रही हैं और इसीलिए यह बहुत पहले से ‘राष्ट्रभाषा’ कहलाती हैं क्योंकि हिंदी की सार्वदेशीकता संपूर्ण भारत के सामाजिक स्वरूप का प्रतिफल है। भारत की विशालता के अनुरूप ही राष्ट्रभाषा विकसित हुई है जिससे उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम कहीं भी होने वाले मेलों-चाहे वह प्रयाग में कुंभ हो अथवा अजमेर शरीफ़ की दरगाह हो या विभिन्न प्रदेशों की हमारी सांस्कृतिक एकता के आधार स्तंभ तीर्थस्थल हों- सभी स्थानों पर आदान-प्रदान की भाषा के रूप में हिंदी का ही अधिकतर प्रयोग होता है। इस प्रकार इन सांस्कृतिक परंपराओं से हिंदी ही सार्वदेशिक भाषा के रूप में लोकप्रिय हैं विशेषकर दक्षिण और उत्तर के सांस्कृतिक संबंधों का क्षेत्र विस्तृत है।

सम्पर्क भाषा हिंदी आयाम जनभाषा हिंदी सबसे व्यापक और लोकप्रिय है जिसक प्रसार क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर से बढ़कर भारतीय उपमहाद्वीप तक हैं। शिक्षित, अर्धशिक्षित, अशिक्षित तीनों वर्गों के लोग परस्पार बातचीत आदि के लिए और इस प्रकार मौखिक माध्यम में जनभाषा हिंदी का व्यवहार करते हैं।

भारत की लिंग्वे, फ्रांका, लैंग्विज आव वाइडर कम्युनिकेशन, पैन इंडियन लैंग्विज, अंतर प्रादेशिक भाषा, लोकभाषा, भारतव्यापी भाषा, अखिल भारतीय भाषा ये नाम ‘जनभाषा’ हिंदी के लिए प्रयुक्त होते हैं। हमारे देश की बहुभाषिकता के ढाँचे में हिंदी की विभिन्न भौगोलिक और सामाजिक क्षेत्रों के अतिरिक्त भाषा व्यवहार के क्षेत्रों में भी सम्पर्क सिद्धि का ऐसा प्रकार्य निष्पादित कर रही है, जिसका न केवल कोई विकल्प नहीं, अपितु जो हिंदी की विविध भूमिकाओं को समग्रता के साथ निरूपित करने में भी समर्थ है।

हिंदी ने पिछले हजार वर्षों में विचार विनिमय का जो उत्तरदायित्व निभाया है वह एक अनूठा उदाहरण है। कुछ लोगों की यह धारणा है कि हिंदी पहले ‘राष्ट्रभाषा’ कहलाती थी। बाद में इसे ‘संपर्क भाषा’ कहा जाने लगा और अब इसे ‘राजभाषा’ बना देने से इसका क्षेत्र सीमित हो गया है। वस्तुतः यह उनका भ्रम है।

जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है कि हिंदी सदियों से संपर्क भाषा और राष्ट्रभाषा एक साथ रही है और आज भी है। भारत की संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को इसे राजभाषा के रूप में स्वीकार कर लेने से उसके प्रयोग का क्षेत्र और विस्तृत हो गया है। जैसे बंगला, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम आदि को क्रमशः बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल आदि की राजभाषा बनाया गया है।

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राजभाषा के रूप में हिंदी

ऐसा होने से उन भाषाओं का उत्तरदायित्व और प्रयोग क्षेत्र पहले से अधिक बढ़ गया है। जहाँ पहले केवल परस्पार बोलचाल में काम आती थी या उसमें साहित्य की रचना होती थी, वही अब प्रशासनिक कार्य भी हो रहे हैं। यही स्थिति हिंदी की भी है। इस प्रकार हिंदी संपर्क और राष्ट्रभाषा तो है ही, राजभाषा बनाकर इसे अतिरिक्त सम्मान प्रदान किया गया है। इस प्रसंग में डॉ॰ सुरेश कुमार का कथन बहुत प्रासंगिक है: ‘हिंदी को केवल संपर्क भाषा के रूप में देखना भूल होगी।

हिंदी, आधुनिक भारतीय भाषाओं के उद्भव काल से मध्यदेश के निवासियों के सामाजिक संप्रेषण तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की भाषा रही है और अब भी है। भाषा संपर्क की बदली हुई परिस्थितियों में (जो पहले फ़ारसी-तुर्की-अरबी तथा बाद में मुख्य रूप से अंग्रेजी के साथ संपर्क के फलस्वरूप विकसित हुई) तथा स्वतंत्र भारतीय गणराज्य में सभी भारतीय व्यवहार की अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग में लाने के निर्णय के बाद, हिंदी का सम्पर्क भाषा प्रकार्य, गुण और परिमाण की दृष्टि से इतना विकसित हो गया है कि उसके संबंध में चिंतन तथा अनुवर्ती कार्य, एक सैद्धांतिक और व्यावहारिक आवश्यकता बन गए हैं।

वास्तव में भाषा संपर्क की स्थिति ही किसी संपर्क भाषा के उद्भव और विकास को प्रेरित करती है या एक सुप्रतिष्ठित भाषा के सम्पर्क प्रकार्य को संपुष्ट करती है। हिंदी के साथ दोनों स्थितियों का संबंध है। आंतरिक स्तर पर हिंदी अपनी बोलियों के व्यवहारकर्ताओं के बीच सम्पर्क की स्थापना करती रही हैं और अब भी कर रही हैं, तथा बाह्य स्तर पर वह अन्य भारतीय भाषा भाषी समुदायों के मध्य एकमात्र संपर्क भाषा के रूप में उभर आई हैं। जिसके अब विविध आयाम विकसित हो चुके हैं। कुल मिलाकर हिंदी का वर्तमान गौरवपूर्ण है। उसकी भूमिका आज भी सामान्य जन को जोड़ने में सभी भाषाओं की अपेक्षा सबसे अधिक कारगर है।

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