Ayurved Kya Hai? आयुर्वेद की उपयोगिता पर निबंध

आयुर्वेद पूरे शरीर को स्वस्थ रखने की दुनिया की सबसे पुरानी प्रणाली है। यह 3000 वर्ष से भी ज़्यादा समय पहले भारत में विकसित हुआ था। और आज हम आयुर्वेद के जनक, आयुर्वेद की औषधि और उपयोगिता के साथ ही यह भी विस्तार से जानेंगे कि Ayurved Kya Hai?

कुछ हजार वर्ष पहले आधुनिक आचार पद्धति ने दिमाग व शरीर के सम्बंध को स्वस्थ जीवन का आधार माना है। भारत में संतों ने यह कार्य बहुत पहले विकसित किया है जो विश्व की सबसे प्राचीन और शक्तिशाली दिमाग व शरीर को स्वस्थ रखने वाली प्रणाली है। यह संबंध बीमारियों को सही रखने में बेहद मददगार है। आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है।

Ayurved Kya Hai?

आयुर्वेद एक विचार-आधारित उपचार है जिसमें अच्छे स्वास्थ्य का आधार मन, शरीर और आत्मा के संतुलन एवं सामंजस्य को माना जाता है। साधारण रोगों के लिए आयुर्वेद में बहुत ही अच्छे उपचार उपलब्ध हैं।

बहुत सारी बीमारियाँ जैसे सिरदर्द, चरम रोग, माइग्रेन, मोटापा, गैस, मधुमेह आदि का उपचार आयुर्वेद में बताया गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य है अच्छी सेहत का प्रचार व प्रसार करना, ना कि बीमारियों से लड़ना। किंतु उपचार कुछ विशेष बीमारियों को केंद्रित कर किया जाता है।

आयुर्वेद का मतलब क्या होता है?

आयुर्वेद दो शब्दों से मिलकर बना है, आयुर् + वेद। आयुर का अर्थ है जीवन, और वेद का अर्थ है- विज्ञान अथवा ज्ञान। यह विवेक पर आधारित है जिससे लोग स्वस्थ एवं सक्रिय होते हैं। साथ ही वह अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा व कार्य क्षमता को पहचान पाते हैं। आयुर्वेद इस बात पर बाल देता है कि “बचाव ईलाज से बेहतर है।” Prevention is better than cure.

आयुर्वेद में निपुण व्यक्ति एक ऐसी उपचार योजना बनाता है जो केवल व्यक्ति के अनुसार बनायी जाती है। यह आपके शारीरिक एवं संवेगात्मक संबंधों को बनाते हुए प्राथमिक जीवन को जोड़ती है। आयुर्वेद में विश्वास करने वाले व्यक्तियों का मानना है कि हमारा शरीर 5 मूल तत्वों (पंचमहाभूतों से मिलकर बना है- हवा, जल, अग्नि, पृथ्वी एवं आकाश) आयुर्वेद उपचार का उद्देश्य होता है अवशिष्ट भोजन पदार्थों को शरीर में से साफ करना जो आपको बीमार कर सकते हैं।

इस साफ करने वाली प्रक्रिया को पंचकारम कहते हैं जिस भी योजना आपके शरीर में उपस्थित अवशिष्ट पदार्थों के लक्षण कम करने के लिए की जाती है। साथ ही शरीर में संतुलन एवं सामंजस्य बढ़ जाता है।

इस सामंजस्य को स्थापित करने के लिए आयुर्वे में निपुण ब्यक्ति खून साफ, मालिश, औषधीय तेल एवं जड़ी-बूटी आदि पर काम करता है। इसका मूल उद्देश्य यही है कि शरीर, मन एवं आत्मा के संतुलन पर ही स्वास्थ्य आधारित होता है। यह बीमारियों से लड़ने के साथ-साथ अच्छी सेहत पर बल देता है।

10 Lines Essay on Ayurveda in Hindi

  1. आयुर्वेद के नियमों के अधीन स्वास्थ्य एक व्यक्तिगत विषय है। यह हर व्यक्ति की अलग-अलग प्रकृति मानता है।
  2. इससे व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक एवं शारीरिक संगठन स्थिति का आंकलन किया जाता है। वही व्यक्ति के बीमार होने के कारणों की व्याख्या करता है।
  3. प्रकृति में मानव शरीर की तीन ऊर्जाओं को समाहित किया जाता है। इन्हें ही ‘दोष’ कहते हैं। यह दोष संख्या में तीन होते हैं। हर व्यक्ति के अंदर तीनों दोषों के लक्षण माने जाते हैं किंतु दो यह एक लक्षण मुख्य रूप से पाए जाते हैं।
  4. पित्त ऊर्जा को अग्नि से जोड़ा जाता है और यह पाचन तंत्र और पित्ताशय प्रणाली को नियंत्रित करता है। पित्त ऊर्जा को तीक्षण, बुद्धिमान एवं गतिमान माना जाता है।
  5. जब पित्त की ऊर्जा पर प्रभाव पड़ता है तो अल्सर, गैस, अपच, ग़ुस्सा, दिल की समस्या और जोड़ों में दर्द प्रारम्भ हो जाता है।
  6. वात ऊर्जा को हवा और आकाश से संबंद्ध माना जाता है। यह शारीरिक अंगों से भी जुड़े हुए हैं। वात ऊर्जा वाले व्यक्ति ज़िंदादिल, कलात्मक, मौलिक सोच-विचार वाले होते हैं। वात ऊर्जा अधिक या न्यून होने पर जोड़ों का दर्द, क़ब्ज़, चरम रोग, चिंता व अन्य रोग होते हैं।
  7. कफ ऊर्जा का तात्पर्य पृथ्वी व जल से माना जाता है। कफ ऊर्जा को ताकत एवं विकास को नियंत्रित करने के लिए प्रयुक्त करते हैं। यह सीने, कमर एवं धड़ से जुड़ा होता है।
  8. कफ ऊर्जा वाले व्यक्ति बलशाली और ताकतवर होते हैं। इनकी प्रकृति शांत होती है। कफ ऊर्जा ज़्यादा या कम होने पर मोटापा, मधुमेह, साइनस समस्या एवं पित्ताशय की समस्या होती है।
  9. हर व्यक्ति का अपना तीन दोषों से बना हुआ शरीर होता है। किंतु कोई भी दोष तत्व दूसरे की तुलना में अधिक पाया जाता है। हर दोष शरीर के किसी-न-किसी कार्य को नियंत्रित करता है।
  10. यह भी माना जाता है कि दोषों के संतुलन के आधार पर ही व्यक्ति बीमार होता है। इसी से उसकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ बढ़ती हैं।

आयुर्वेदिक औषधि से इलाज कैसे किया जाता है?

रोग का पता चलने के पश्चात पेशेवर आयुर्वेदिक डॉक्टर व्यक्ति के लिए निजी योजना बनाता है। यह योजना उसके आहार, योग, जड़ी-बूटी, व्यायाम और मालिश पर आधारित होती है। यह उपचार पद्धति दोषों के मध्य संतुलन बनाने में सहायता करती है।

  • आहार- विशेष आहार की सहायता से व्यक्ति के दोधों को दूत करने का प्रयास किया जाता है।
  • साफ-सफ़ाई और विषहरण (detoxification)- यह व्रत, आहार, शारीरिक उपचार और एनीमा (गुदा उपचार) के माध्यम से किया जाता है।
  • जड़ी-बूटी औषधि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी और मसालों के उदाहरण है- हल्दी, त्रिफला, अश्वगंधा, गुगुल आदि।
  • शारीरिक उपचार और मालिश- इसके उदाहरण हैं- अभयंग  (एक आयुर्वेदिक शैली से किया गया मालिश) और शिरोधरा (एक उपचार जिसमें जड़ी-बूटी को गर्म तेल में मिलाकर माथे पर लगाते हैं।)
  • हर्बल चाय- पित्त चाय, वात चाय, कफ चाय
  • योग, ध्यान, व्यायाम, आदि।

जिंदगी हमें अनेक परेशानियाँ एवं अवसर प्रदान करती है। यह सत्य है कि उन पर हम क़ाबू नहीं कर सकते किंतु हम खानपान एवं जीवन शैली में परिवर्तन कर स्वयं को बीमार होने से बचा सकते हैं। जीवन के संतुलन व स्वास्थ्य हेतु हमें ध्यान रखना आवश्यक है। खानपान एवं जीवन शैली व्यक्ति के शरीर, मस्तिष्क और चेतना को बढ़ाती है।

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