आचार्य रामचंद शुक्ल का साहित्यिक परिचय: इतिहास दृष्टि, रचनाएँ, निबंध शैली, आलोचना पद्धति और हिन्दी साहित्य में योगदान

आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिन्दी साहित्य के महान इतिहासकार और आलोचक हैं। यदि शुक्ल जी ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास‘ नहीं लिखा होता तो सम्भवतः साहित्येतिहास लेखन की मार्गदर्शिनी परम्परा की नींव नहीं पड़ी होती। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ से पूर्व हिंदी गद्य में लिखा हुआ हिंदी साहित्य का कोई इतिहास-ग्रंथ प्राप्त नहीं होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का साहित्यिक परिचय

रामचंद्र शुक्ल जी अधीत व्यक्ति थे। उन्होंने स्वाध्याय के बल पर हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य, मनोविज्ञान और इतिहास आदि विषयों का गहन अध्ययन, मनन और अनुशीलन भी किया था। शुक्ल जी हिंदी के प्रथम सुधी समीक्षक और आलोचक भी हैं।

हिंदी आलोचना के वास्तविक प्रवर्त्तन का श्रेय शुक्ल जी को ही जाता है।

न्होंने आलोचना के लिए सैद्धांतिक मानदंडों को बनाया, उसका समुचित विनियोग अपनी व्यावहारिक समीक्षा में भी की। इसमें कहीं भी कोई विरोधाभास नहीं दिखायी देता। कबीर, जायसी और तुलसी विषयक उनकी आलोचन इस बात के प्रमाण हैं।

अंग्रेजों एवं अन्य पाश्चात्य विद्वानों द्वारा उनकी अपनी भाषा में लिखित हिंदी साहित्य के कुछ इतिहास ग्रंथ उस समय अवश्य उपलब्ध थे। स्वयं हिंदी में इतिहास के नाम पर उपलब्ध ग्रंथ ‘वचनिका’ और ‘वार्त्ता’ के रूप में थे या कविवृत्त संग्रह के रूप में लिखे गए थे।

ये ग्रंथ कई प्रकार की भूलों और भ्रांतियों से भरे पड़े थे। इनमें सहित्येतिहास लेखन की कोई वैज्ञानिक चेष्टा नहीं मिलती। शुक्ल जी के पूर्व के इतिहासकारों ने अधिक अभिरुचि हूँ-दोष विवेचन या तुलनात्मक अध्ययन में दिखलायी। शुक्ल जी ने सर्वप्रथम हिंदी-साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास लिखा।

उन्होंने हिंदी-साहित्य के युगों का विभाजन भी किया और नामकरण भी। यद्यपि उनके इस प्रयत्न की कुछ सीमाएँ भी हैं तथापि उन्होंने इस प्रकार का नाम या युग-विभाजन प्रस्तुत नहीं कर पाए हैं यद्यपि विवाद अवश्य करते रहे हैं। इसी से उनके सहित्येतिहास लेखन के महत्त्व का पता भी चलता है।

रामचंद्र शुक्ल का जीवन परिचय

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म उत्तरप्रदेश के एक गाँव ‘अगौना’ में सन 1884 ई. में हुआ था। जो व्यक्ति एम.ए. की परीक्षा पास नहीं कर सका, उसने ऐसी आलोचनाएँ लिखीं और समीक्षा के ऐसे मानदंड प्रस्तुत किए कि उसको समझने में दिग्गजों का माथा भी चक्कर खा जाता है।

शुक्ल जी ने आजीविका के लिए हेडक्लर्क का काम भी किया और ड्राइंग शिक्षक भी बने। लेकिन उनकी प्रतिभा को वास्तविक उत्कर्ष तब प्राप्त हुआ जब काशी नागरी प्रचारिणी सभी ने उन्हें ‘हिंदी शब्द सागर’ के सम्पादन के लिए निमंत्रित किया। यह भी एक मानक कार्य है। शुक्ल जी ने ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का भी सम्पादन किया था।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना पद्धति

शुक्ल जी की आलोचना-दृष्टि में भारतीय एवं पाश्चात्य आलोचना दृष्टियों का रासायनिक समावेश मिलता है। कभी-कभी इन्हें पृथक करना कठिन हो जाता है। शुक्ल जी ने अनेक भारतीय और प्श्चात्य मीमांसकों को उद्धत अथवा संदर्भित किया है।

ऐसे मीमांसकों से आज के तथाकथित प्रकांड विद्वान भी अपरिचित हैं। उनकी काव्य-चिंतन विषयक जागरूकता अद्वितीय है। सामान्य शब्दों में शुक्ल जी की आलोचना दृष्टि को ‘रसवादी’ कह सकते हैं। उनको आलोचना दृष्टि लोकमंगल की भावना से निर्मित हुई है।

उनकी दृष्टि में काव्य के आदर्श तुलसी हैं और उनके स्वयं के आदर्श तुलसी हैं। वे सूर की काव्यकला की प्रशंसा करके भी उन्हें तुलसी के बराबर स्थान नहीं दे सके। उनकी अपनी कुछ निजी मान्यताएँ थीं- वे रहयवाद और व्यक्ति वैचित्र्यवाद के कटु आलोचक थे। उनकी आलोचन दृष्टि की कुछ सीमा है। वे छायावाद, रहस्यवाद का सम्यक् मूल्यांकन नहीं कर सके। जायसी का मूल्यांकन करते हुए उसमें निहित अभारतीय तत्त्वों की भी उन्होंने आलोचना की है।

शुक्ल जी ने अपनी आलोचना में रस, अलंकार के आधार को गृहीत किया तथा उसे मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान किया। फलस्वरूप भारतीय काव्यशास्त्र के इस विस्मृत अध्याय को फिर से प्रतिष्ठा मिली।

रामचंद्र शुक्ल की निबंध शैली

शुक्ल जी एक कुशल निबंधकार भी थे। उनके निबंधों के तीन संग्रह प्रकाशित हैं। ये संग्रह ‘चिंतामणि’ के नाम से जाने जाते हैं। एक भाग में मनोविकार सम्बन्धी यथा लोभ और प्रीति, उत्साह, घृणा आदि विषयक निबंध संग्रहित हैं जबकि अन्य खंडों में कविता आदि विषयक सैद्धांतिक निरूपण हैं।

शुक्ल जी एक सरस हृदय कवि भी थे। उन्होंने कहानी भी लिखी थी। उनका ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में ‘हिंदी की गोल्डेन ट्रेज़री’ भी है। उनके विषय में आचार्य नलिन विलोचन शर्मा की यह उक्ति अत्यंत सटीक है कि किसी भी भारतीय भाषा में शुक्ल जी से बढ़कर कोई दूसरा आलोचक उनके समय में नहीं था।

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